और क्या कहूं ...
मेरे सपनो को चोरी कर
मेरे सपनो को चोरी कर
वो महल अपना बना गए
जिस घर ने उनको सहारा दिया
वो उसी की दीवार दहा गए ....
ना खुदा का खोफ
ना अपनी रूह की आवाज़
वो जीते जी अपने आप को
भरे बाज़ार मे बिकवा गए ...
और क्या कहूं ...
मै नादान चला उनको बचाने
दोस्ती का फ़र्ज़ निभाने
और वो मेरी लाश पे चढ़ कर
रास्ता अपना बना गए
शिकवा यह नहीं की
दगा वो दे गए हमें
पर दर्द यह की
जाते जाते भी वो हमें
गुनाहगार कहलवा गए
और क्या कहूं ...
ना मेरी सिक्शत हुई
ना वो जीते
बस हमारी दोस्ती को वो हरवा गए
जिसने अपनी जिंदगी उनके नाम कर दी थी
वोह उसी को अपने दुश्मनों से मरवा गए
और क्या कहूं ...
यह दुनिया वाले भी कितने बेरहम होते हैं
मेरी मौत के बाद मेरी लाश को
भी उसी के नाम करवा गए
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