मैंने सोच भी लिया था कि फ़ोन से मैं क्या-क्या
करूँगा। पहला काम मैं करूँगा स्कूल का होम वर्क, जैसे ज़्यादातर बच्चे
करते हैं। मोबाइल ना होने के कारण मुझे बाकी बच्चों से कॉपी लेनी पड़ती। कई बच्चों
की लिखावट तो इतनी गंदी होती कि वो खुद भी ना समझ पाए कि क्या लिखा है। वैसे कॉपी करते वक्त समझ भी कहाँ
आता है, क्या लिखा है, सिर्फ उतारना ही
तो होता है। खैर, अब मुझे और लोगों पर निर्भर नहीं होना
पड़ेगा। दूसरा काम, मैं करूँगा मोबाइल पर विडीओ गेम्ज़ खेलने
का। सबसे पहले पबजी और फ़्रीफ़ायर खेलूँगा, फिर अन्य गेम्ज़।
तीसरा काम गुरु रंधावा के गाने सुनना। चौथा काम इंस्टाग्राम पर अकाउंट ओपन करना।
जैसे ही मोबाइल आया रमेश भैया ने साफ़ कह दिया
कि मोबाइल पर गेम्ज़ मत खेलना। इस साल कक्षा दस की परीक्षा देनी है, गेम्ज़
की बजाय पढ़ाई पर ध्यान दो। भैया भी अजीब हैं , खुद पढ़ने
में इतने कमजोर हैं और ज्ञान मुझे देते हैं। अगर पढ़ लिख लेते तो आर्मी के लिए
इतना भागना ना पड़ता। खैर कुछ दिनों में फ़ोन मेरे हाथ आ ही गया और बहुत जल्दी मुझे
इसकी लत लग गयी।
मैं
हर दिन घंटों फ़ोन का इस्तेमाल करता। पापा, माँ और भाई अपनी दुनिया में
इतने बिज़ी थे कि किसी को फ़र्क़ ही नहीं पड़ता कि मैं क्या कर रहा हूँ। वैसे भी
थोड़ी बहुत चालाकी मैंने सीख ली थी। घर वालों के सामने तो मै मोबाइल खोल कर होम वर्क
करता रहता ताकि उनको लगे कि मैं पढ़ाई कर रहा हूँ पर उनके पीठ पीछे मैं जमकर
मोबाइल पर खेलता।
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