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जाने किसका दीवाना था वो , शायद मेरा ही फ़साना था वो। मैं आँखें बंद करती तो वो कविता लिखता मैं आँखें खोलती तो वो तस्वीर बनाता मैं सोचती तो वह मुस्कुराता मैं उठ कर जाती तो पीछा तक करता मैं मुस्कुराती तो वह आहें भरता क्यो इतना रूमानी था वो शायद मेरा ही फ़साना था वो जाने किसका दीवाना था वो |

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