मोहब्बत के गीत गुनगुनाते क्यों हो
पत्थर में दिल नहीं होता
उसकी मूरत बनाते क्यों हो
सुनने में अच्छी लगे पर हकीकत में पूरी ना हो
ऐसी कहानी सुनाते क्यों हो
अगर कबूल है अपनी बेवफाई
तो अपनी गुनहगारी छुपाते क्यों हो
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