मैं बरसों खोजती रही
उसको भुलाने के रास्ते !
और खुद को भूल
गयी उसके वास्ते !
एक दिन अरसा गुजरे
उसके घर दस्तक दे डाली
उसका मकान था खाली
जगह बड़ी सुनसनी थी वो
कहते हैं उसी मकान की छत से कूदा था वो
हँसते हुए
इतना प्यारा मस्ताना था
शायद मेरा ही फ़साना था वो
जाने किसका दीवाना था वो

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