अब उसे
फिरदौस का उसके कमरे में आना पतझड़ के मौसम में किसी पत्ते के हवा में उड़ कर एक
अंजान राहगीर के बालों में लिपट जाने सा लगता है। उस राहगीर ने उस पत्ते को अपना
समझ अपनी डायरी में रख लिया था। ये वादे करते हुए कि अब ये पत्ता उसके जीवन का
अटूट हिस्सा होगा पर हुआ वही जैसे सूखे पत्तों का होता है। डायरी में किसी पन्ने
में गुम हो जाते हैं और फिर किसी दिन उन पर नज़र पड़ती है तो याद आता है कि वो भी
कभी थे।
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