Saturday, October 26, 2024

CO-MAT-OSE


  एक दिन कोडी के स्कूल में छुट्टी थी और वह दिन के वक़्त ही दरवाज़े पर आकार हॉर्न देने लग पड़ा। कमरे में फिरदौस आयी थी और उसका बिलकुल भी मन नहीं था फिरदौस को छोड़ कर कोडी के पास जाने का पर जब काफ़ी देर तक दरवाज़े पर दस्तक होती रही तो फिरदौस ने जाकर दरवाज़ा खोल दिया। फिरदौस को देखकर कोडी चौंक गया और खामोश हो गया। फिरदौस ने काफ़ी कोशिश कि उससे मलयालम में बात करने की और पूछने कि उसके घर और स्कूल के बारे में पर कोडी कुछ नहीं बोला। 

जब फिरदौस ने पूछा कि क्या वह उसे अपनी बस में ले कर जाएगा तो उसने हाँ में जवाब दिय । फिरदौस ने जब पूछा कि कहाँ जा रहे हो तो वो बोला – मेदक।

“अरे वाह, चलो आज हम तीनों  मेदक चलते हैं”। फिर तीनों  चल पड़े मेदक के रास्ते। वह चटाई में बैठ कर कंडक्टर की आवाज़ में उनको गाइड़ करता और कोडी और फिरदौस दोनों  बस में बैठने की ऐक्टिंग करते हुए गाड़ी चलाते रहे। फिरदौस ने अब ड्राइवर सीट पर क़ब्ज़ा कर लिया था और कोडी उसके कंधे पर था। उन दोनों  को एक साथ देख कर वह अजीब से ख़यालों में खो गया कि आखिर ये कैसी दुनिया बना डाली है तीनों ने। क्या ये दुनिया असली है या काल्पनिक? एक सात साल का बच्चा जो किसी से बात नहीं करता, एक बाईस  साल की आइ टी एंजिनीयर जो घर वालों से लड़-झगड़ कर अलग रहना चाहती है और सताईस  साल का एक आवारा अजनबी जिसका ठिकाना हर साल बदलता है ,कैसे एक छत पर मिल कर एक अलग सी दुनिया रचा डाले हैं।

 कुछ देर में तीनों मेदक पहुँच चुके थे। बस रुक गयी। कोडी अपने घर चला गया, फिरदौस अपने ऑफ़िस चली गयी और वह काफ़ी देर तक इस सवाल के साथ ख़यालों के सागर में गोते लगता रहा कि क्या कभी उसके सफ़र का अंत भी होगा? नौ साल का था, जब उसने पहले बार अपने घर मुंसियारी से नैनीताल के लिए बस से सफ़र किया था। पापा और वह साथ आए थे बोर्डिंग स्कूल में । उसके दाख़िले के वक़्त पापा ने उसे बताया था कि इस स्कूल से अमिताभ बच्चन भी पढ़े हैं! उसका घर इस शहर से बहुत दूर था।

 तब उसे घर, घर सा लगता था। घर में मम्मी-पापा, भाई, चाचा-चाची, दादा-दादी सब साथ रहते थे। फिर एक-एक करके सब चले गए, एक दूसरे से दूर। पापा उसकी स्कूल की पढ़ाई ख़त्म होने से पहले ही चल बसे थे। कुछ सालों बाद दादा और दादी भी गुज़र गए। भाई पढ़ाई के लिए दिल्ली चला गया और वहीं का हो गया। अब वह, पत्नी और बेटे के साथ वहीं रहता है। चाचा और चाची को भी मुंसियारी छोड़े हुए बरसों हो गए और अब वे हल्द्वानी को ही अपना घर मानते हैं।

  ईज़ा कुछ साल दिल्ली में रही और कुछ वक्त हल्द्वानी। अपने आख़िरी समय में वह अपने गाँव में अपने घर की छत पर पूरा समय काट देती। इसी इंतज़ार में कि कभी उनके बच्चे वापिस घर लौटेंगे पर कोई नहीं लौटा। एक दिन उसी छत पर बैठे-बैठे वह भी ऐसे सफ़र पर निकल गयी, जहां से कोई वापिस नहीं आता। यही कहानी गाँव के अन्य परिवारों की भी है, ज़्यादातर लोग मुंसियारी छोड़ कर या तो दिल्ली चले गए या हल्द्वानी आ गए। आज उनके गाँव को भुतिया गाँव के नाम से जाना जाता है क्योंकि गाँव में कोई नहीं है सिर्फ़ पुराने वीरान पड़े घरों के अलावा।

 सुना है कि आजकल लोग जब उसके गाँव आते हैं तो उन्हें लकड़ी से बने घर देख कर अच्छा लगता है। छत, फ़र्श’, खिड़कियाँ, दरवाज़े, और तो और सीढ़ियाँ भी- सब कुछ लकड़ी का। उन सीढ़ियों से उतरकर वह पहली बार बस स्टैंड आया और फिर नैनीताल के लिए बस क्या पकड़ी, फिर लौट कर वापिस नहीं गया। दूसरी बार बस दिल्ली की थी और फिर बसें बदलता चला गया। फिरदौस और कोडी में शायद वह ख़ुद के अतीत के सवालों को खोजने की कोशिश करता। भले ही तीनों की कहानियाँ बिल्कुल अलग थी पर सफ़र तीनों का दिलचस्प था और अपने-अपने हिस्से का ग़म भी तीनों की ज़िंदगी में था।

कोडी तीन साल का था जब उसके पापा की बस दुर्घटना में मौत हो गयी थी। वह हैदराबाद से मेदक की वोल्वो बस चलाते थे

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