Monday, October 21, 2024

पहाड़ का प्रेम

 


 

तुम धारों को लांघना चाहती थी 

 

पर मैं पहाड़ नहीं था।

 

तुम थक कर सुस्ताना चाहती थी 

 

पर मैं बुगयाल नहीं था।



ठंड मे बिल्ली की तरह

 

सुकड़ कर बैठ जाती थी 

 

तुम चूल्हे के सामने 

 

पर मैं अंगेठी की आग नहीं था।



पहाड़ की लड़की के माफिक

 

कोशिश जरूर की तुमने 

 

मुझे किल्टे में समेटने की 

 

पर मैं घास नहीं था।


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