तुम धारों को लांघना चाहती थी
पर मैं पहाड़ नहीं था।
तुम थक कर सुस्ताना चाहती थी
पर मैं बुगयाल नहीं था।
ठंड मे बिल्ली की तरह
सुकड़ कर बैठ जाती थी
तुम चूल्हे के सामने
पर मैं अंगेठी की आग नहीं था।
पहाड़ की लड़की के माफिक
कोशिश जरूर की तुमने
मुझे किल्टे में समेटने की
पर मैं घास नहीं था।
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